Wednesday, March 7, 2018

अनकही




हम बताते भी बहुत हैं 
और छुपाते भी बहुत हैं 
बताते हैं अपने हालात,
छुपाते हैं अपने जज़्बात ।



हम बेशर्म भी बहुत हैं 
और शर्माते भी बहुत हैं 
बेशर्मी हमारे बोलने में है 
शर्म हमारी आंखों में है ।

हम में प्यार भी बहुत है 
और नफरत भी बहुत है
प्यार परायों के लिए है 
नफरत अपनों के लिए ।

हम हारे हुए भी बहुत हैं
और जीते हुए भी बहुत हैं 
हारे है  पल पल ज़िन्दगी से
जीते हैं कतरा कतरा मरते हुए खुद से ।

हम रोये भी बहुत हैं 
और हँसे भी बहुत हैं 
रोये हैं अपनी मजबूरियों पर 
हँसे हैं अपनी खुदगर्ज़ी पर ।

हम सच्चे भी बहुत हैं 
और झूठे भी बहुत हैं 
सच हम दूसरों से बोलते हैं 
और झूठ खुद से ।

हम खुश भी बहुत हैं 
और दुखी भी बहुत हैं 
खुश अपनी उड़ान पर हैं
दुखी चुकाई हुई कीमत पर हैं ।

हम मरे भी बहुत हैं 
और ज़िंदा भी बहुत हैं
मरे अपनी नींदों में हैं 
ज़िंदा लोगों के दिलों में हैं ।



                                                                     -कुमार

Thursday, March 1, 2018

मेघदूत




अाजादी की इस बेला में 
भारत माँ के चरणों में मैंने शीश झुकाया है
आज मैंने अपनी छत पर 
फिर तिरंगा लहराया है ।

आजादी के इस जयघोष को 
सारी दुनिया में फैलाना
ए- बादल मेरे मेघदूत बन तुम जाना।

लाखों ने अपनों को खोया 
हजारों ने सिर कटवाया है
यूँ ही नहीं मिली आजादी 
सूद सहित इसका मोल चुकाया है।

आज शहीदों के सम्मान में 
मैंने कोटि-कोटि शीश झुकाया है
जन्नत में बैठे उन शहीदों को
मेरा संदेसा पहुँचाना
ए- बादल मेरे मेघदूत बन तुम जाना ।


काश्मीर की पावन घाटी में 
आज भी जवान खूनी होली खेल रहे 
सरहद पर खड़े सिपाही को 
मेरा ये संदेसा पहुँचाना 
ए-बादल मेरे मेघदूत बन तुम जाना ।

⇛एक सवाल आप सब के लिए

Pocket में डालकर English को 

MacD अौर Dominos में Pizza Burger खाते हो
Angrejo को हमने खदेड़ दिया
पर क्या इसे आजादी कहते हो ?

पूरे देश में मेरा ये सवाल फैलाना
कालिदास को फिर जीवंत कर
ए-बादल मेरे मेघदूत बन तुम जाना ।


                                                                              -   कुमार

जिंदगी की माला




टूट के हर बार बिखर जाती है
    जिंदगी की माला
मैं फिर संभालता हूँ
          पिरोता हूँ एक एक मोती ।


वो रूठती है, हर बार
   मैं मनाता हूँ 
इसी जद्दोजहद मे
       थक कर बैठ जाता हूँ 
फिर से उठता हूँ 
       संभलता हूँ, मनाता हूँ ।

शायद नाराज है मुझसे
       पर कहती नहीं कुछ भी
जख्म अपने 
       छुपाती है,
          दिखाती नहीं फिर भी ।

उम्मीद है, एक दिन 
     रूबरु होगी मुझसे
बैठेंगे, सुनाएंगे 
       किस्से और कहानियां
भूलेंगे शिकवे
       सुलझेंगी परेशानियां ॥
     
                                                                                     - कुमार

कुछ यूँ सीख रहा हूँ मैं




इस ज़माने के तौर तरीके 
        कुछ यूँ सीख रहा हूँ मैं

नोट के बदले वोट बदले
वोट की खातिर इंसान को हैवान बनते
देख रहा हूँ मैं।


गाढ़ा था जो मेहनत से उनकी 
      उस लहू में पानी मिलते देख रहा हूँ मैं।

क्षणभंगुर था जो नील गगन में 
     उस श्वेत बदली को रोता देख रहा हूँ मैं।

सिंचित था जो संस्कारों से 
     उस उपवन को उजड़ते देख रहा हूँ मैं
अविरल बहती धारा को 
       ठहरकर सड़ते देख रहा हूँ मैं।

देख चंद टुकड़े कागज़ के 
     नियत बदलते देख रहा हूँ मैं ।

रंग बिरंगे कागज़ की खातिर
       अपनों को पराया होते देख रहा हूँ मैं।

थी गवाह जो मासूम बचपन की 
      उन आँखों का पानी मरते देख रहा हूँ मैं।

इस ज़माने के तौर तरीके 
कुछ यूँ सीख रहा हूँ मैं ।

                                                                                               - कुमार 

मैं कुछ कुछ तुझसा हूँ



तू सूरज की लाली जैसी 
में रात चांदनी लिखता हूँ ,
      तू नहीं मेरे जैसी 
      पर मैं कुछ कुछ तुझसा हूँ ।

तू कर्ण प्रिय सुरों की स्वामिनी 
में बेसुरी कव्वाली लिखता हूँ, 
    प्यास जो दरिया की बुझा दे
    मैं उस नदिया का पानी हूँ ।



पुष्प है तू हरित उपवन का
में भूमि बंजर लिखता हूँ ,
     प्रेम सरिता है , दिल में तेरे जो
     मैं उसका अधिकारी हूँ ।

प्रज्ञा है तू महाकाव्य की
में जड़ बुद्धि लिखता हूँ,
      दिल में जमे हिम को पिघला दे
      मैं ऐसी चिंगारी हूँ ।

देवी है तू उजियारे की 
मैं रातगामिनी लिखता हूँ,
      तू नहीं मेरे जैसी 
      पर मैं कुछ कुछ तुझसा हूँ ।

                      -कुमार                   

Monday, February 26, 2018

न जाने कब मोहब्बत कर आये हम



ये ज़िंदगानी, ये रवानी
ये महफ़िल, ये तन्हाई
सब तेरी ज़ुल्फ़ों पे वार आये हम
न जाने कब मोहब्बत कर आये हम ।

ये आँसू, ये गम
ये हंसी ठिठोली
तेरे होंठों पे छोड़ आये हम
न जाने कब मोहब्बत कर आये हम ।

ये अपने, ये पराये
ये नींद, ये सपने
तेरी आँखों मे छोड़ आये हम 
न जाने कब मोहब्बत कर आये हम ।

ये भूख, ये प्यास
थोड़ी जो थी तुझसे मिलने की आस
तेरी डोली पे वार आये हम 
न जाने कब मोहब्बत कर आये हम ।

-कुमार

बंजारा


यूँ ही रंग बिरंगे कमाते कमाते 
बेघर हो गए हैं घर आते जाते
घोंसला तो है पर ठिकाना नहीं 
अपने पराये हो गए हैं ठिकाना बनाते बनाते ।



समझते हैं बोली मेरी अब अनजान परिंदे भी 
खुद से अनजान हो गए हैं पहचान बनाते बनाते ।

सुना था जंजीरें टूटी थी सैनतालिस में गुलामी की,
फिर गुलाम हो गए हैं आजादी का जश्न मनाते मनाते ।

हुई सांझ, लौटे परिंदे अपनो के पास, थकान मिटाने को
हम भी शायद कभी लौटे घर प्यास अपनी भुझाने को ।

राह से किसी गुजरते हुए एक सौंधी सी महक आयी है
शायद किसी माँ ने अपने हाथों से अपनों के लिए रोटी पकाई है ।
परोसे जाएंगे हमे भी छपन भोग बड़ी सी थाल में, 
बैठे हैं हम भी उसी लम्हे की राह में ।

बंजारा हूँ आवारा सा, राही मैं अनजान राहों का ।

                                       -कुमार